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बीजेपी और काग्रेस के पद चिन्हों पर चल रही आम आदमी पार्टी

उतराखण्ड की सत्ता पर कभी क्षेत्रीय दल काबिज नही हो पाया ये बहुत दुखद वा दुर्भाग्य पूर्ण रहा या यूं कहें कि क्षेत्रीय दल कभी प्रदेश की जनता के मन मे अपनी जगह नही बना पाये, प्रदेश की इसी कमजोरी का फायदा पिछले 20 वर्षो से लगातार राष्टृय पार्टियां उठा रही हैं।
उसमे चाहे काग्रेस हो या बीजेपी एक एक कर दोनो ही दलों ने सत्ता का स्वाद चखा है। दोनों ही दल की सरकारें बारी बारी से उत्तराखण्ड पर राज करती आई है। हम बात करे बीजेपी की या फिर बात करें कोग्रेस की दोनो में एक तो समानता मिलती है की ये दोनो ही दल दिल्ली से संचालित होने वाले दल हैं।

अगर दूसरे शब्दों में कहें तो इन दोनो दलों की लगाम दिल्ली में बैठे इनके आकाओं के हाथों में रहती हैं। वे जैसे चाहे वैसे प्रदेश की सत्ता अपने हिसाब से मोड़ देते है। प्रदेश का मुखिया बदलना तो मानो उनके एक आदेश पर ही रातो रात बदल जाता है।
इन सबके बीच जो ठगा जाता है वो है प्रदेश का आम जनमानस
जिसके खून पसीने की गाढी कमाई को ये राष्टृय दल दोनो हाथों से बर्बाद कर रहे है।
अब बात कर लेते हैं आम आदमी पार्टी की
प्रदेश में सत्ता का सपना सजो रही आम आदमी पार्टी को भी इन दोनो राष्टृय दलों से कम आकना सरासर बेमानी होगा बल्कि यूं कहें कि ये तो बीजेपी और कोग्रेस से भी चार कदम आगे है।
सूत्रों के अनुसार आप का तो हाल इन दोनो राष्टृय दलों से भी बहुत बुरा है। सत्ता पाने को बेचेन आम आदमी पार्टी संगठन में दिल्ली का इतना अधिक हस्तक्षेप है कि पूरे प्रदेश में कोई भी पदाधिकारी अपनी मर्जी से कोई छोटी बड़ी नियुक्ति तक नही कर सकता कोई प्रवक्ता बिना दिल्ली की इजाजत कुछ बोल भी नही सकता।

यहाँ तक कि सूत्र बताते है की आप के प्रदेश अध्यक्ष तक को एक वार्ड गठित करने तक का अधिकार नही है। क्या इन परिस्थितियों में आप कार्यकर्ता मन से काम कर पायेंगे, क्या दिल्ली के लोग अपने लोगो का मनोबल गिराने का काम नही कर रहे।

पिछले दिनों दिल्ली के मुख्यमंत्री व आप के राष्ट्रिय संयोजक श्री अरविंद केजरीवाल ने उत्तराखण्ड का दौरा किया केजरीवाल के इस दौरे से प्रदेश के आप कार्यकर्ता बहुत उत्साहित दिख रहे थे पर अपने राष्टृय संयोजक से ना मिल पाना उन्हें एक कड़वा अनुभव दे गया। दबी जुबां में तो कार्यकरता अपनी इस तोहीन का जिम्मेदार सीधा प्रदेश प्रभारी को मानते है। कार्यकर्ताओ के बीच ये सुगबुगाहट पार्टी में विद्रोह का कारण ना बन जाए। और कहीं ऐसा ना हो जाए आप पार्टी के भीतर असंतुष्ट कार्यकर्ता आने वाले विधानसभा के चुनाव में कांग्रेस और भाजपा का दामन थामते नजर आएं।

अब यदि प्रदेश मे आप का अब तक खाता तक नही खुला है और अभी से प्रदेश संगठन में दिल्ली का इतना अधिक हस्तक्षेप है तो सोचानीय है कि यदि गलती से आप सत्ता मे आ गई तो उम्मीद की जा सकती है की प्रदेश फिर से दिल्ली का गुलाम बन जाए फिर बार बार मुखिया बदले जाए।
उत्तराखण्ड एक बार फिर कहीं लुटेरो के हाथों की कठपुतली बन जाए और इसका खामियाजा फिर प्रदेश की आम जनता को उठाना पड़ जाए।

मु.संपादक-राजिक खान

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