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राजधानी देहरादून की सड़कों की समस्या बन चुके बेरोकटोक सरपट दौड़ रहे ओवरलोड वाहन, सोया हुआ प्रशासन

देहरादून:आवरलोड वाहन सड़कों पर सरपट दौड़ रहे हैं। इससे जहां सड़क हादसों का ग्राफ बढ़ रहा है वहीं सड़कें क्षतिग्रस्त भी हो रही है। प्रशासनिक तंत्र के इशारों पर खुलेआम ओवरलोड वाहन चल रही है आलम यह है परिवहन विभाग, पुलिस विभाग एवं अन्य प्रशासनिक तंत्रों पर सेटिंग का आरोप लग रहा है कि ओवरलोड वाहनों पर कार्रवाई करने के लिए यह विभाग सामने नहीं आ रहे हैं परिवहन और पुलिस विभाग द्वारा चेकिंग के नाम पर मात्र खानापूर्ति की जा रही है। ऐसे में ओवरलड वाहनों पर शिकंजा कसने की बजाए विभाग सुस्ती अपनाए हुए हैं।

देहरादून शहर में हिमाचल प्रदेश के पांवटा साहिब व पछवादून क्षेत्र की यमुना नदी और आसन नदी से खनन सामग्री बड़े-बड़े डंफरो के माध्यम से पहुंचाई जाती है जो कि इन दिनों वाहन ओवरलोड भरकर बिना किसी रोक-टोक के दौड रहे हैं इससे राजस्व की तो हानि हो ही रही है साथ ही लगातार सड़क दुर्घटनाएं भी बढ़ रही है और साथ ही करोड़ों रुपए लागत से बनी सड़कें भी क्षतिग्रस्त हो रही हैं। प्रशासन और संबंधित विभाग ओवरलोड पर कार्यवाही करना चाहे तो देहरादून शहर में नो एंट्री होने के चलते सैकड़ों की तादाद में ओवरलोड खनन सामग्री से भरे डंपर धर्मावाला चौक पर और पीलियो नया गांव शिमला बायपास रोड पर खड़े मिल जाएंगे।

सूत्रों के बताये अनुसार ओवरलोड वाहनों के चलने से अवैध वसूली का भी खेल जोरों पर होता है , परिवहन विभाग एवं अन्य प्रशासनिक तंत्र के मिलीभगत होने के बाद ही ओवरलोड वाहन खुलेआम सड़क पर दौड़ रहे है वाहन मालिकों ने नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया कि व प्रत्येक गाड़ी की मासिक एंट्री जमा की जाती है।हम लोगों का आरटीओ एवं पुलिस विभाग के मिले बिना कार्य नहीं हो सकता।

कई हो चुकी है मौत, कई लोग हो चुके हैं घायल……..

ओवरलोड वाहनों के चपेट में जिले में कईयों की मौत विगत 5 वर्षों के दौरान हो गई है एवं कई लोग घायल हुए है परंतु संबंधित विभाग के अधिकारीयों के कानों में जूं तक नहीं रेंगता। इन्हें आम नागरिकों के मौत को लेकर कुछ लेना-देना नहीं सिर्फ सेटिंग ही सब कुछ है ।

अधिकारी कार्यवाही करना तो दूर फोन उठाना भी मुनासिब नहीं समझते

विकासनगर ए.आर.टी.ओ सुशील निरंजन जी से जानकारी चाहने के लिए जब फोन किया जाए तो मजाल है कि उनके द्वारा एक बार भी फोन उठाया जाए और यही हाल अन्य संबंधित अधिकारियों का भी है पत्रकारों का फोन देख कर आला अधिकारियों को शायद नींद आ जाती है और साहब फोन उठाने की जरा भी जहमत नहीं उठाते अब अगर उनसे जानकारी लेने के लिए फोन ना किया जाए तो इसकी जवाबदेही किसकी होगी।

मुख्य संपादक-
राजिक खान

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